Concept note ऋग्वैदिक साहित्य का रचना काल 1500 B.C से 600 B.C तक माना जाता है। किन्तु कुछ आधुनिक शोध में इस सभ्यता को 5000 B.C के पास दर्शाया जा रहा है। वेद, ब्राह्मण, आरण्यक तथा उपनिषद (वेदांत) क्रमश: वैदिक साहित्य के अन्तर्गत आते है। वैदिक साहित्य की रचना 1500 ई. पू. से 600 ई. पू. के बीच हुई है।
Concept note यजुर्वेद कर्मकाण्ड प्रधान ग्रन्थ है। यजु का अर्थ यज्ञ होता है। इसमें आर्यो के याज्ञिक नियमों एवं विधियों का उल्लेख मिलता है। इसके मन्त्रों के उच्चारण को करने वाले को अध्वर्यु कहते है। ऋग्वेद: आर्यो के सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक एवं राजनीतिक जीवन का विषद वर्णन ऋग्वेद में मिलता है। ऋग्वेद के पाठ करने वाले पुरोहित को होतृ कहा जाता था। सामवेद:- साम का अर्थ-गान से है। सामवेद भारतीय संगीत का जनक माना जाता है। सामवेद का पाठ करने वाले पुरोहित को उद्गाता कहा जाता था। अथर्ववेद:- तंत्र, मंत्र, जादू, टोना, वशीकरण एवं उपचार सम्बन्धी औषधियों से सम्बन्धित सूक्तों एवं मंत्रों का संकलन है। इस वेद के पुरोहित ब्रह्मा जी थे।
Concept note रावी नदी को वैदिक काल (ऋग्वैदिक काल) में परुष्णी के नाम से जाना जाता था। दसराज्ञ युद्ध का उल्लेख ऋग्वेद के 7 वें मंडल में है, यह युद्ध परुष्णी नदी के तट पर सुदास एवं दस जनों के बीच लड़ा गया, जिसमें सुदास विजयी हुआ। रावी नदी हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में रोहतांग दर्रे से निकलकर हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर तथा पंजाब होते हुए पाकिस्तान में चली जाती है। अस्किनी को चिनाब, शतुद्रि को सतलज तथा विपाशा को व्यास के आधुनिक नाम से जाना जाता है।
Concept note ऋग्वैदिक काल में भारत की अनेक नदियों का उल्लेख मिलता है। जिनमें प्रमुख रूप से सतलज (शुतुद्री), व्यास (विपाशा), झेलम (वितस्ता), रावी (परुष्णी), गंगा, यमुना, सरस्वती (सबसे पवित्र नदी) चेनाब (अस्किनी) गंडक (सदानीरा) इत्यादि हैं। ऋग्वेद में गंगा का १ बार, तथा यमुना का ३ बार उल्लेख मिलता है।
Concept note आर्यो के उद्गम स्थान के बारे में कई विचार प्रचलित है– दयानन्द सरस्वती–आर्यो का उद्गम स्थान तिब्बत था। मैक्स मूलर–आर्यो का उद्गम स्थान मध्य एशिया था। गाइल्स और मैकडॉनेल–आर्यो का उद्गम स्थान दक्षिण-पूर्वी यूरोप है। बाल गंगाधर तिलक–आर्यो का उद्गम स्थान उत्तरी-ध्रुव है।
Concept note सांख्य दर्शन संप्रदाय की स्थापना ‘कपिल’ द्वारा की गई थी। सांख्य दर्शन भारतीय दर्शन के छ: प्रकारों में से एक है, जो प्राचीनकाल में अत्यन्त लोकप्रिय था।
Concept note वेदों को भली-भाँति समझने के लिए 6 वेदांगों की रचना हुई- 1. शिक्षा – स्वर शास्त्र (Phonology) (नॉक) 2. ज्योतिष – ज्योतिष शास्त्र (Astrology)(आँख) 3. कल्प – अनुष्ठान शास्त्र (Ritual)(हाथ) 4. व्याकरण – व्याकरण शास्त्र (Grammar)(मुख) 5. निरूक्त – शब्द की उत्पत्ति का अध्ययन (Study of history of word) (कान) 6. छंद – कविता के छंद (Poetic meters)(पैर)
Concept note वैदिक युग में राजा को गोपति (गायों का स्वामी) कहा गया। वैदिक काल में गायों को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया। ऋग्वेद में गायों को अघन्या (मारना वर्जित) कहा गया है। गायों को पूज्य एवं पवित्र माना गया तथा धनी व्यक्ति को गोमत कहा गया है।
Concept note भारत में वैदिक सभ्यता सरस्वती नदी के किनारे विकसित हुई थी। ऋग्वेद में सरस्वती नदी को नदियों की अग्रवती, नदियों की माता, वाणी, प्रार्थना एवं कविता की देवी, बुद्धि को तीव्र करने वाली और संगीत की प्रेरणादायी कहा गया है। सरस्वती नदी ऋग्वेद की सबसे पवित्र नदी मानी जाती थी। इसे नदीतमा (नदियों की माता) कहा गया है। सरस्वती नदी अब राजस्थान के रेगिस्तान में विलीन हो गई है।
Concept note वेद, उपनिषद्, पुराण और धर्मसूत्र संस्कृत भाषा में लिखे गये हैं। भारत का सर्वप्राचीन धर्मग्रन्थ वेद है, जिसके संकलनकर्ता कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास को माना जाता है। वेद चार है- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद। सबसे प्राचीन वेद ऋग्वेद एवं सबसे बाद का वेद अथर्ववेद है।
Concept note ऋग्वेद सबसे पुराना वेद है। यह सनातन धर्म का सबसे आरम्भिक श्रोत है। वेदों की संख्या (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद) 4 है। ऋग्वेद में 1028 सूक्त तथा 10462 ऋचाएं हैं। जिसमें देवताओं की स्तुति की गई है। इसमें देवताओं का आह्वान करने के लिए मंत्र दिया गया है।
Concept note ऋग्वेद की उत्पति संस्कृत भाषा के ऋक (स्तवन करना) शब्द से हुई है जिसका अर्थ छन्दों एवं चरणों से युक्त मंत्र जो देवताओं की स्तुति में गाये गये हैं। ऋग्वेद में एक हजार से अधिक (1028) स्तुतियां शामिल की गई हैं, उन्हें ‘सूक्त’ कहा जाता है। ऋग्वेद में- 10 मण्डल, 8 अष्टक, 64 अध्याय, 1017 मूल सूक्त, 11 बल खिल्य सूक्त, 1028 कुल सूक्त 10462 ऋचाएं शामिल हैं।
Concept note चतुर्वर्ण समाज की कल्पना का आदि स्रोत ऋग्वेद के 10वे मंडल में वर्णित पुरुषसूक्त है, जिसके अनुसार चार वर्ण (ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र) है। भारत का सबसे प्राचीन धर्मग्रन्थ वेद है, जिनके संकलन कर्ता महर्षि ‘वेद व्यास’ है। वेद चार है- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एंव अथर्ववेद।
Concept note वेद विश्व के प्राचीनतम साहित्य तथा हिन्दुओं के आधारभूत धर्मग्रन्थ हैं। वेद मुख्यत: चार है- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद। ऋग्वेद को चारों वेदों में सबसे प्राचीन माना जाता है। इसे 10 मण्डलों (1028 सूक्तों) में विभाजित किया गया है जिनमें कुल 10462 ऋचाएं (मंत्र) है। यूनेस्कों ने ऋग्वेद की 1800 से 1500 ई.पू. की 30 पांडुलिपियों को सांस्कृतिक धरोहर की सूची में शामिल किया है।
Concept note संहिता हिन्दू धर्म के पवित्रतम और सर्वोच्च धर्मग्रन्थ वेदों का मन्त्र वाला खण्ड है। ये वैदिक वांग्मय का पहला हिस्सा है जिसमें काव्य रूप में देवताओं की यज्ञ के लिए स्तुति की गयी है। इनकी भाषा वैदिक संस्कृत है। चार वेद होने के कारण चार संहिताएँ भी है। भाषाविद और इतिहासकार ऋग्वेद संहिता को पूरे विश्व के सबसे प्राचीन ग्रन्थों में से एक मानते हैं।
Concept note अग्नि, सोम, इंद्र वैदिक देवता थे, जबकि दुर्गा शाक्त धर्म से सम्बन्धित देवी थीं। वैदिक देवताओं की संख्या 33 बतायी गयी है। जिनमें अग्नि, सोम, बृहस्पति, रूद्र, इंद्र प्रजापति, पर्जन्य, द्यौस, वरूण, मित्र इत्यादि प्रमुख देवता थे। वैदिक काल में सबसे महत्वपूर्ण देवता इन्द्र थे उसके बाद अग्नि का स्थान था। वैदिक कालीन देवियों में ऊषा, अदिति, पृथ्वी, इला, सरस्वती, अरण्यानी, भारती इत्यादि प्रमुख थी। ८
Concept note भारत के राष्ट्रीय प्रतीक पर उल्लिखित ‘सत्यमेव जयते’ शब्द मुंडकोपनिषद् से लिया गया है। जिसका अर्थ है। सत्य की ही विजय होती है। यह भारत के राष्ट्रीय प्रतीक पर नीले देवनगरी लिपि में अंकित है इसे राष्ट्र पटल पर लाने और उसका प्रचार करने में पंडित महामना मदनमोहन मालवीय की महत्वपूर्ण भूमिका रही। भारत का आदर्श राष्ट्रीय वाक्य सत्यमेव जयते मुण्डकोपनिषद में उल्लिखित है। जिसका अर्थ - ‘सत्य की सदैव विजय होती है।’ भारत का यह राष्ट्रीय आदर्श वाक्य महान मौर्य सम्राट अशोक द्वारा सारनाथ (वाराणसी-यू.पी.) में स्थापित सारनाथ के अशोक स्तम्भ के शीर्ष से लिया गया है। यह स्तम्भ शीर्ष (भारत का) हमारे देश का राजचिन्ह भी है। उपनिषदों की कुल संख्या 108 है। प्रश्न में उल्लिखित अक्षि, गरुण, महावाक्य नाम का कोई भी उपनिषद नहीं है। मुण्डकोपनिषद में यज्ञ को टूटी हुई नौका के समान बतलाया गया है। तथा कहा गया है कि जो मनुष्य इनका अनुकरण करेगा वह बारम्बार जरामृत्यु को प्राप्त होगा।
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