Concept note मगध साम्राज्य की उत्पत्ति 6वीं शताब्दी ई.पू. से चौथी शताब्दी के मध्य हुआ था। मगध उत्तर भारत में सबसे शक्तिशाली और समृद्ध साम्राज्य के रूप में उभरा। मगध साम्राज्य के संस्थापक ‘जरासंध’ और ‘बृहद्रथ’ थे। इसका विकास ‘हर्यक वंश’ के समय में शुरू हुआ, इसका विस्तार ‘शिशुनाग’ एवं ‘नंद वंश’ के समय हुआ और अंतत: ‘मौर्य वंश’ के शासनकाल में मगध साम्राज्य अपने सर्वोच्च स्तर पर पहुँच गया। मगध साम्राज्य पर ‘गुप्त वंश’ ने शासन कभी नहीं किया था।
Concept note अजातशत्रु मगध का एक प्रतापी सम्राट एवं हर्यक वंश के महान शासक बिंबिसार का पुत्र था। उसने अपने पिता की हत्याकर राज्य प्राप्त किया था। अजातशत्रु ने अंग, लिच्छवि, वज्जि, कोशल तथा काशी जनपदों को अपने राज्य में मिलाकर एक विस्तृत सम्राज्य की स्थापना की थी। बुद्ध का महापरिनिर्माण इसके शासनकाल की सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना थी।
Concept note मगध साम्राज्य ने 544 ई.पू. से 323 ई.पू. तक शासन किया। इस साम्राज्य में हर्यक वंश, शिशुनाग वंश और नंद वंश थे। वज्जि एक महाजनपद था जो आठ राज्यों का संघ था। इसकी राजधानी वैशाली थी। बुद्ध के समय में यह एक शक्तिशाली संघ था। हर्यक वंश के शासक अजातशत्रु ने वज्जि को मगध साम्राज्य में मिला लिया था।
Concept note बिहार की राजधानी पटना का पुराना नाम पाटलिपुत्र है। सम्राट अजातशत्रु के उत्तराधिकारी उदयिन ने अपनी राजधानी को राजगृह से पाटलिपुत्र स्थानांतरित किया और बाद में चन्द्रगुप्त मौर्य ने यहाँ साम्राज्य स्थापित कर अपनी राजधानी बनाई। जिससे पाटलिपुत्र सत्ता का केन्द्र बन गया। फाहियान ने अपने यात्रा वृतान्त मे उसका जीवन्त वर्णन किया और मेगस्थनीज ने पाटलिपुत्र नगर का प्रथम लिखित विवरण दिया।
Concept note जैन धर्म के वास्तविक संस्थापक 24वें तथा अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी थे। इनका जन्म 540/599 ई.पू. वैशाली के कुण्डग्राम में हुआ था, जिसे आधुनिक बसाढ़ कहते है। बारह वर्ष की कठिन तपस्या के बाद महावीर को अंग देश के जृम्भिक ग्राम के निकट ऋजुपालिका नदी के तट पर साल वृक्ष के नीचे ज्ञान (कैवल्य) प्राप्त हुआ। ज्ञान प्राप्ति के बाद महावीर स्वामी ने अपना पहला उपदेश राजगृह में बितूलाचल पहाड़ी पर बराकर नदी के तट पर दिया। महावीर की मृत्यु (मोक्ष की प्राप्ति) राजगृह के निकट पावापुरी में 72वर्ष की अवस्था में हुई।
Concept note वर्धमान महावीर जैन धर्म के २४वें तथा अंतिम तीर्थंकर थे। महावीर का जन्म ५४०/५९९ ई.पू. में वैशाली के कुण्डग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम सिद्धार्थ था, जो कि वज्जि महाजनपद के अंतर्गत आने वाले ज्ञातृक गण (Jnatrika) के मुखिया थे। उनकी माता का नाम त्रिशला था, जो कि वैशाली के लिच्छवि नरेश चेटक की बहन थी।
Concept note जैन धर्म में कुल 24 तीर्थज्र्र या वीतराग हुए। तीर्थज्र्र उसे कहते हैं जो मानव को संसार रूपी सागर से पार उतारे। पूज्य होने के कारण तीर्थज्र्रों को अर्हत भी कहा जाता है। एक से 22 तक तीर्थज्र्रों की ऐतिहासिकता संदिग्ध है 23वें तीर्थज्र्कर पार्श्वनाथ तथा 24 वें तीर्थज्र्र महावीर स्वामी ऐतिहासिक पुरुष माने जाते है। जैन धर्म के प्रथम तीर्थज्र्र ऋषभदेव/आदिदेव/केशरियानाथ का जन्म अयोध्या में इक्ष्वाकु वंश के क्षत्रिय परिवार में हुआ था। वहीं 23वें तीर्थज्र्र पार्श्वनाथ काशी के राजा अश्वसेन के पुत्र थे। 24वें तीर्थज्र्र महावीर स्वामी का जन्म वज्जि गणराज्य के ज्ञातृक क्षत्रियों के संघ के प्रधान सिद्धार्थ के यहाँ वैशाली (कुण्डग्राम) में हुआ था।
Concept note ‘पर्युषण पर्व’ जैन धर्म के अनुयायियों द्वारा मनाया जाता है। इस पर्व का मुख्य आधार जीवन के नैतिक मूल्यों को धारण करना, सत्य और अहिंसा के रास्ते पर चलना है। इस समुदाय के लोग क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, तप, त्याग, आकिचन्य और ब्रह्मचर्य गुणों का पालन करते है।
Concept note जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी का जन्म वैशाली के निकट कुण्डग्राम (बिहार) के ज्ञातृक कुल के प्रधान सिद्धार्थ के यहां 540/599 ईसा पूर्व में हुआ था। इनकी माता का नाम त्रिशला तथा पत्नी का नाम यशोदा था। 30 वर्ष की अवस्था में गृहत्याग के बाद 12 वर्ष की कठोर तपस्या के बाद महावीर को जृम्भिकग्राम के समीप ऋजुपालिका नदी के किनारे एक साल के वृक्ष के नीचे ‘कैवल्य’ (सर्वोच्च ज्ञान) प्राप्त हुआ इनकी मृत्यु पावापुरी में 468/527 ई.पू. में हुई। जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव थे।
Concept note जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं। तीर्थंकर जैन धर्म में उसके संस्थापक एवं जितेन्द्रिय तथा ज्ञान प्राप्त महात्माओं की उपाधि थी। जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव एवं चौबीसवें तीर्थकर महावीर स्वामी थे। जैन महात्माओं को निर्ग्रन्थ (बन्धनरहित) तथा जैन संस्थापकों को तीर्थंकर कहा गया। तीर्थंकर दो शब्दों ‘तीर्थ’ और ‘कर’ से मिलकर बना है। तीर्थ का अर्थ उन विविध नियमों से है जो मनुष्य को इस भवसागर से पार उतार दे। ऋग्वेद में ऋषभदेव और अरिष्टनेमि का उल्लेख मिलता है।
Concept note संथारा या अन्वर्थकी या निष्प्रतिकारमरण्वैकुण्ठ सल्लेखना, जैन समुदाय का एक धार्मिक संस्कार है। जैन धर्म में इसका अर्थ उपवास द्वारा प्राण त्याग करना है। संथारा श्वेताम्बरों में प्रचलित है जबकि दिगम्बर इस परम्परा को सल्लेखना कहते है। चन्द्रगुप्त मौर्य, राष्ट्रकूट नरेश इन्द्र चतुर्थ तथा विद्वान हेमचन्द्र अपने जीवन के अन्तिम समय में इसी पद्वति के द्वारा मृत्यु का वरण किया था।
Concept note कैवल्य जैन धर्म से सम्बन्धित है। जैन धर्म में कैवल्य को सर्वोच्च एवं पूर्ण ज्ञान कहते हैं जो केवल तीर्थज्र्र को ही प्राप्त होगा। जैन धर्म में अज्ञान से पूर्ण ज्ञान की ओर बढ़ते समय 14 गुणस्थान (चरणों) से गुजरना पड़ता है इसमें 13वाँ चरण ज्ञान का है यह जिसे प्राप्त होगा वह ‘अर्हत्’ कहलायेगा। एक अर्हत् को जव सिद्धान्त देने की क्षमता प्राप्त हो जाती है तो उसे कैवल्य की प्राप्ति होगी तथा अव वह तीर्थज्र्र कहलायेगा। महावीर स्वामी को गृहत्याग के 12 वर्ष पश्चात 42 वर्ष की अवस्था में जृम्भिक ग्राम के समीप ऋजुपालिका नदी (उज्जुवालिया) वर्तमान वराकर नदी के तट पर समगा गृहस्थ के खलिहान में शालवृक्ष के नीचे कैवल्य की प्राप्ति हुई।
Concept note जैनियों द्वारा अपने पवित्र ग्रन्थों के लिए सामूहिक रूप से जैन आगम (साहित्य) शब्द का प्रयोग किया जाता है। इसके अन्तर्गत 12 अंग 12 उपांग, 6 छेदसूत्र, 4 मूलसूत्र 10 प्रकीर्णक, 2 चूलिका सूत्र, नान्दीसूत्र एवं अनुयोगद्वार को सम्मिलित किया जाता है। अंगों एवं उपांगों पर जो भाष्य लिखे गये है वे निर्युक्ति, चूर्णि, एवं टीका, कहलाते है। क्योकि विकल्प में आगम शब्द का उल्लेख नहीं है इसलिए अंग माना जा सकता है।
Concept note जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव और चतुर्थ तीर्थंकर अभिनंदनाथ का जन्म स्थान अयोध्या (उत्तर प्रदेश) था। विदित है कि जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए तथा 24 वें एवं अन्तिम तीर्थंकर महावीर स्वामी थे।
Concept note महावीर जैन धर्म के चौबीसवे तीर्थकर है। महावीर का जन्म करीब ढाई हजार साल पहले वैशाली राज्य के कुण्डलपुर ग्राम में हुआ था। महावीर की शिक्षाएं, आज भी बल्लभी गुजरात में उपस्थित है जो लगभग 1500 वर्ष पूर्व लिखी गई थी।
Concept note बौद्ध सभायें– सभा समय स्थान अध्यक्ष शासनकाल प्रथम बौद्ध 483 ई.पू. राजगृह महाकश्यप अजातशत्रु संगीति द्वितीय बौद्ध 383 ई.पू. वैशाली सर्वकामी कालाशोक संगीति तृतीय बौद्ध 251 ई.पू. पाटलिपुत्र मोग्गलिपुत्त अशोक संगीति तिस्स चतुर्थ बौद्ध ई. की प्रथम कुण्डलवन वसुमित्र/ कनिष्क संगीति शताब्दी अश्वघोष
Concept note पालि एक अप्रचलित प्राकृत है। बौद्ध धर्म का वैधानिक साहित्य ‘पालि’ भाषा में है जिसे त्रिपिटक कहते है। तीनों पिटक हैं- विनयपिटक, सुत्तपिटक तथा अभिधम्मपिटक।
Concept note महात्मा बुद्ध की मौसी (पालनकर्ता) महाप्रजापति गौतमी पहली महिला थी, प्रिय शिष्य आनन्द के कहने पर जिन्हें भिक्षुणी के रूप में चुना गया था।
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